मंजुला की माला: बंद द्वार के सामने एक आँसू 🙏 | गुरुवायूर के बरगद की कथा
हर शाम अपने हाथों से गूँथी एक माला गुरुवायूरप्पन के लिए — यही थी मंजुला की दुनिया। रास्ते में रोज़ एक साँवला ग्वाला लड़का उससे हँसी-ठिठोली करता। एक शाम उसकी बाँसुरी की धुन में खोई मंजुला को देर हो गई, और मंदिर के द्वार बंद हो गए।
भक्त-कवि पूंतानम के कहने पर उसने वह माला बरगद के नीचे चढ़ा दी। अगली भोर, भगवान के गले में अपने-आप प्रकट हुई एक नई माला! मान्यता है कि वह ग्वाला कोई और नहीं, स्वयं कान्हा थे। उस दिन से वह बरगद कहलाता है 'मंजुलाल' — मंजुला का बरगद।
भगवान को महँगे फूल नहीं चाहिए — चाहिए प्रेम से भरा एक मन।
📖 कथा: त्रिशूर की शांताकुमारी से सुनी हुई
🎬 Made by Santosh Roy
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यह वीडियो लोक-मान्यताओं और पारंपरिक कथाओं पर आधारित है।
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